नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)
नाभिकीय संलयन वह जटिल प्रक्रिया है जिसमें हाइड्रोजन के परमाणु अत्यधिक उच्च तापमान और दाब पर आपस में मिलकर हीलियम का निर्माण करते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान द्रव्यमान का एक छोटा हिस्सा लुप्त हो जाता है और विशाल मात्रा में ऊर्जा के रूप में प्रकट होता है। हमारे सूर्य और ब्रह्मांड के अन्य तारों के भीतर निरंतर यही प्रक्रिया चलती रहती है, जो अरबों वर्षों से उनके असीमित प्रकाश और ऊष्मा का मुख्य स्रोत बनी हुई है।
यद्यपि मनुष्यों ने इस प्रक्रिया की विनाशकारी शक्ति का उपयोग करके ‘हाइड्रोजन बम’ (Hydrogen Bomb) का निर्माण तो कर लिया है, लेकिन शांतिपूर्ण और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इसे नियंत्रित करके बिजली बनाना आज भी विज्ञान के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है। वर्तमान में ITER (International Thermonuclear Experimental Reactor) नामक एक वैश्विक संगठन इस असीमित ऊर्जा तकनीक को साकार करने पर काम कर रहा है, जिसमें भारत सहित दुनिया के कई अग्रणी देशों के वैज्ञानिक अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।
नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)
संलयन के ठीक विपरीत, नाभिकीय विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें एक भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम) को दो छोटे हिस्सों में तोड़ा जाता है। इस तकनीक को मनुष्यों ने बहुत अच्छी तरह से समझ और नियंत्रित कर लिया है। वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देश इसका उपयोग न केवल परमाणु बम (Destructive weapons) बनाने के लिए कर रहे हैं, बल्कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों (Nuclear Power Plants) में व्यावसायिक रूप से सुरक्षित बिजली का उत्पादन करने के लिए भी बड़े पैमाने पर कर रहे हैं।
2. पृथ्वी पर जीवन का क्रमिक विकास (Evolution of Life)
पृथ्वी का शीतलन और परतों का निर्माण
अपने शुरुआती दौर में पृथ्वी आग के एक धधकते हुए गोले के समान अत्यधिक गर्म थी, लेकिन समय के साथ यह धीरे-धीरे ठंडी होती गई। इस शीतलन (Cooling) प्रक्रिया के दौरान, गुरुत्वाकर्षण और घनत्व के आधार पर पदार्थों का आंतरिक अलगाव (Differentiation) हुआ। इसके परिणामस्वरूप, लोहे जैसे भारी और सघन तत्व पृथ्वी के केंद्र की ओर चले गए जिससे ‘क्रोड’ (Core) बना, जबकि हल्के और कम घनत्व वाले पदार्थ सतह की ओर तैरते रहे, जिससे पृथ्वी की विभिन्न आंतरिक परतों (क्रस्ट और मेंटल) का निर्माण हुआ।
वायुमंडल और महासागरों का जन्म
इस प्रक्रिया के दौरान पृथ्वी के भीतर दबी हुई हल्की गैसें ज्वालामुखीय विस्फोटों और दरारों के माध्यम से बाहर निकलीं, जिसने हमारे प्रारंभिक वायुमंडल की नींव रखी। जैसे-जैसे वायुमंडल ठंडा हुआ, जलवाष्प संघनित होकर मूसलाधार वर्षा के रूप में बरसी। लाखों वर्षों तक चली इस अनवरत वर्षा के कारण पृथ्वी के बड़े-बड़े गड्ढे भर गए और विशाल महासागरों का जन्म हुआ। इन्हीं सुरक्षित महासागरों के भीतर सबसे पहले जीवन की पहली चिंगारी सुलगने के अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार हुईं।
जीवन के विकास का क्रम (Chronology of Evolution)
पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत सबसे पहले महासागरों में एककोशकीय साइनोबैक्टीरिया (ब्लू-ग्रीन शैवाल) के रूप में हुई। इसके बाद क्रमिक विकास के तहत जल में रहने वाले जटिल जीव (मछलियाँ) अस्तित्व में आए। समय के साथ इन जीवों ने जमीन पर कदम रखा और जल तथा थल दोनों जगह रहने में सक्षम उभयचर (Amphibians) विकसित हुए। उभयचरों के बाद रेंगने वाले सरीसृप (Reptiles) आए, और फिर स्तनधारी (Mammals) तथा पक्षियों का विकास हुआ। इसी लंबी विकास यात्रा के अंतिम चरण में आधुनिक मानव (Homo sapiens) का उदय हुआ।
वायुमंडल का परिवर्तन
यह एक दिलचस्प तथ्य है कि पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड CO2 की मात्रा अत्यधिक थी और जीवनदायिनी ऑक्सीजन O2 न के बराबर थी। शुरुआती जीवित जीवों (जैसे साइनोबैक्टीरिया) ने ही प्रकाश संश्लेषण जैसी जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से इस भारी मात्रा में मौजूद CO2 को सोखना शुरू किया। उन्होंने वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर धीरे-धीरे बढ़ाया और इसे उस वर्तमान स्वरूप में बदल दिया, जो आज हम सभी के जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
3. भूवैज्ञानिक समय पैमाना (Geological Time Scale)
पृथ्वी के लगभग 4.6 बिलियन वर्ष के अत्यंत विशाल और जटिल इतिहास तथा उस पर जीवन के विकास को चरणबद्ध तरीके से समझने के लिए वैज्ञानिक ‘भूवैज्ञानिक समय पैमाने’ का उपयोग करते हैं। यह पैमाना ब्रह्मांडीय और वैश्विक घटनाओं को समय के अनुसार विभाजित करता है।
इस पैमाने को बड़े से छोटे कालखंडों के क्रम में व्यवस्थित किया गया है, जिसका सही पदानुक्रम इस प्रकार है:
इसे आसानी से समझने के लिए हम इंसानी कैलेंडर का उदाहरण ले सकते हैं। जिस प्रकार कई वर्ष मिलकर एक दशक बनाते हैं और कई दशकों से एक शताब्दी बनती है; ठीक उसी प्रकार भूविज्ञान में कई ‘एज’ (Age) मिलकर एक ‘इपोक’ (Epoch) बनाते हैं, कई ‘इपोक’ के समूह से एक ‘पीरियड’ (Period) बनता है, कई ‘पीरियड’ से एक ‘एरा’ (Era) का निर्माण होता है, और कई ‘एरा’ मिलकर समय की सबसे बड़ी और विशाल इकाई ‘इयोन’ (Eon) का निर्माण करते हैं।
4. आकाशगंगा, तारों का जीवनचक्र और ब्लैक होल
मिल्की वे की संरचना और गतिशीलता
हमारी आकाशगंगा, जिसे हम ‘मिल्की वे’ (Milky Way) या मंदाकिनी कहते हैं, आकार में एक सर्पिलाकार (Spiral) संरचना है जो बीच से उभरी हुई (Bulgy) और किनारों से चपटी (Flattened) दिखाई देती है। इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है। हमारा सूर्य भी अकेला या रुका हुआ नहीं है, बल्कि वह अपने पूरे सौरमंडल और ग्रहों के परिवार को साथ लेकर हमारी आकाशगंगा के केंद्र (Galactic Center) की एक विशाल कक्षा में लगातार परिक्रमा कर रहा है।
तारों का वितरण और स्थिति
आकाशगंगा के परिधीय या बाहरी क्षेत्रों (Peripheral regions) में गैस और धूल के नए बादल लगातार संघनित होते रहते हैं, इसलिए यहाँ हमेशा नए और युवा तारे (Young stars) पाए जाते हैं। हमारी पृथ्वी और सूर्य भी आकाशगंगा के केंद्र से दूर, इसी बाहरी हिस्से की एक शाखा (Orion Arm) में स्थित हैं, जहाँ नए तारों के जन्म की प्रक्रिया चलती रहती है।
तारों की वृद्धावस्था और मृत्यु
जैसे-जैसे तारे पुराने होते जाते हैं और उनका ईंधन समाप्त होने लगता है, वे धीरे-धीरे आकाशगंगा के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके केंद्र की ओर बढ़ते जाते हैं। यही कारण है कि आकाशगंगा के घने केंद्र में मुख्य रूप से ऊर्जा विहीन, अत्यंत पुराने या मृत तारे पाए जाते हैं। इनमें अपनी चमक खो चुके श्वेत वामन (White Dwarf) और अत्यधिक घनत्व वाले ब्लैक होल शामिल हैं।
हमारे सूर्य की वर्तमान आयु लगभग 5.9 बिलियन वर्ष है और इसके कोर में अगले 5 बिलियन वर्षों तक नाभिकीय संलयन करने के लिए पर्याप्त हाइड्रोजन ईंधन मौजूद है। जब सुदूर भविष्य में यह ईंधन पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, तो सूर्य अपनी बाहरी परतों को खोकर अंततः एक शांत और ठंडे ‘श्वेत वामन’ (White Dwarf) तारे में बदल जाएगा।
ब्लैक होल (Black Hole) की प्रकृति
ब्लैक होल वास्तव में उन विशालकाय मृत तारों के अवशेष हैं जिनका अंत एक भयंकर विस्फोट (Supernova) के साथ होता है। इनका गुरुत्वाकर्षण बल इतना प्रचंड और अकल्पनीय होता है कि वे अपने आसपास से गुजरने वाले प्रकाश (Light) को भी अपने भीतर खींच लेते हैं और उसे बाहर नहीं निकलने देते। चूँकि किसी वस्तु को देखने के लिए उससे प्रकाश का परावर्तित (Reflect) होकर हमारी आँखों तक पहुँचना आवश्यक है, इसलिए प्रकाश के न लौट पाने के कारण ब्लैक होल पूरी तरह अदृश्य रहते हैं और इन्हें नंगी आँखों या सामान्य दूरबीनों से सीधे नहीं देखा जा सकता।
यूपीएससी (UPSC) के स्तर के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1 किसी ब्लैक होल को साधारण नंगी आंखों (Naked eyes) से क्यों नहीं देखा जा सकता है?
2 प्रारंभिक पृथ्वी के वायुमंडल (जिसमें CO2 अधिक थी) को बदलकर उसमें ऑक्सीजन बढ़ाने का मुख्य श्रेय किसे दिया जाता है?
3 भूवैज्ञानिक समय पैमाने का बड़े से छोटे की ओर सही पदानुक्रम क्या है?
4 पृथ्वी के प्रारंभिक दिनों में जब भारी पदार्थ (Denser materials) नीचे गए और हल्के पदार्थ ऊपर आए, तो इसका क्या परिणाम हुआ?
5 सूर्य में ऊर्जा उत्पन्न करने वाली मुख्य प्रक्रिया कौन सी है?
6 भूवैज्ञानिक समय पैमाने में कई 'Age' (एज) मिलकर किसका निर्माण करते हैं?
7 तारे की मृत्यु का मुख्य अर्थ क्या होता है?
8 'हाइड्रोजन बम' निम्नलिखित में से किस सिद्धांत पर कार्य करता है?
9 'ब्लू-ग्रीन शैवाल' (Blue-green algae) जीवन के विकास के किस चरण में प्रकट हुए?
10 अपने जीवन चक्र के अंत में मृत्यु के बाद हमारा सूर्य संभवतः किस रूप में बदल जाएगा?
11 भूवैज्ञानिक समय पैमाने (Geological Time Scale) की सबसे बड़ी इकाई कौन सी है?
12 ITER (International Thermoelectric Nuclear Reactor) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
13 क्या भारत ITER (International Thermoelectric Nuclear Reactor) का सदस्य है?
14 वर्तमान में दुनिया भर में व्यावसायिक रूप से बिजली बनाने के लिए मुख्य रूप से किस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है?
15 हमारी मिल्की वे आकाशगंगा (Milky Way Galaxy) में बिल्कुल नए और युवा तारे कहाँ पाए जाते हैं?
16 आकाशगंगा के केंद्र (Center) में मुख्य रूप से किस प्रकार के तारे पाए जाते हैं?
17 हमारे सूर्य के पास लगभग कितने और वर्षों तक जीवित रहने (ऊर्जा पैदा करने) के लिए पर्याप्त ईंधन बचा हुआ है?
18 पृथ्वी पर जीवन के विकास का सही कालानुक्रमिक (Chronological) क्रम क्या है?
19 सौरमंडल की उत्पत्ति की व्याख्या मुख्य रूप से किस परिकल्पना (Hypothesis) द्वारा की जाती है?
20 पृथ्वी पर सबसे पहले जीवन की उत्पत्ति कहाँ हुई थी?